Tuesday, June 15, 2010
बाज़ारवाद के सम्मुख एक पहल
आज जब हम लोक लुभावन नारों के साथ बाज़ार के बीचों बीच खड़े हैं और हमारे आप पास लोभवृति का बाहुल्य फैलता जा रहा है जिससे हमारे समाज में एक ऐसी सभ्यता का निर्माण हो रहा है जिसे महाकवि निराला ने ‘पर स्वहारिणी’ सभ्यता कहा था । यह पर स्वहारिणी सभ्यता वर्तमान के भूमंडलीकरण के दौर में आम आदमी की मौलिक स्वतंत्रताओं का लगातार अपहरण करती जा रही है । इससे हम किस तरह से निजात पाएं यह भी हमें ही सोचना होगा ।
घोर बाज़ारीकरण के इस दौर में भाई मायामृग ने क़माल दिखाया और पुस्तक पर्व में रूप में देश के प्रकाशकों को एक नई दिशा देने का प्रयास किया । विगत दिनों पुस्तक पर्व के तहत पहले सेट का विमोचन जयपुर में हुआ इसमें कविता, कहानी और विविध रचनाओं की दस पुस्तकें मात्र सौ रूपयों में उपलब्ध करवाई गई यानि कि एक पुस्तक का मूल्य मात्र दस रूपये । जो संभवतः एक सिगरेट के पैकेट से भी कम है । कविता पुस्तकों में, जहांँ उजाले की रेखा खिंची है दृनंद चतुर्वेदी, भीगे डेनों वाला गरूणदृ विजेन्द्र, आकाश की जात बता भइयादृ चन्द्रकांत देवताले, प्रपंच सार सुबोधिनीदृ हेमन्त शेष की हैं तो कहानियों में, आठ कहानियाँदृ महिप सिंह, गुटनाइट इंडियादृ प्रमोद कुमार शर्मा, घग्घर नदी के टापूदृ सुरेन्द्र सुन्दरम् हैं और विविध के अन्तर्गत कुछ इधर की कुछ उधर की(संस्मरण) डा. हेतु भारद्वाज, जब समय दोहरा रहा हो इतिहास (विविध) नासिरा शर्मा और तारिख की खंजड़ी (डायरी) डा. सत्यनारायण की पुस्तकें है । इस उम्दा साहित्य के प्रथम सेट को हर कोई अपने संग्रह में रखना चाहेगा । साहित्यदर्शन परिवार भाई मायामृग को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर साघुवाद देता है और उनकी आगामी योजना की सफलता कामना करता है ।
इस अंक में हैं स्व. मंजू अरूण की कविताएं, संतोष श्रीवास्तव की कहानी नागफनियों के बीच और शमशेर बहादुर सिंह की डायरी के पन्ने जो आपको जरूर पसन्द आयेंगे ।
रमेश खत्री
http://www.sahityadarshan.com/Sahitya.aspx
डायरी :शमशेर बहादुर सिंह : डायरी के पन्ने
स्कूल की क्लासे ड्रामे के पात्रों की सूरत में अपनी जरूरी तरतीब और मुकाम से खड़ी हो जाए, और सबक, जो कि ड्रामा है, खेला जाए चाहे सबक भाषा और साहित्य का हो, चाहे भूगोल और इतिहास का, चाहे गणित के विभिन्न रूपों में से किसी का, चाहे विज्ञान का, चाहे कला, चाहे राजनीति या अर्थशास्त्र का, चाहे धर्म का ।
हैं तो हमारे नेताओं के पास साधन फिल्म, बैले, नाच, ‘जादू’ के भी तमाशे और क्या चाहिए ; क्यों नहीं उठा देते दुनिया के अवाम का स्तर, क्यों नहीं उसके दिलों दिमाग में बसा देते ‘नयी दुनिया’ का सच्चा रूपः क्यों नहीं खुराफ़ात से उनका दिल फेर देते, उन्हें अच्छा इन्सान बना देते ?
मगर बनाए कौन ? बनाने वाला तो कलाकार होना चाहिए ।
कलाकार तो ज़हर के घूंट पी कर ज़िन्दा रहता हैः आज वही कुछ वह दूसरों को भी पीने के लिए दे सकता है, और कुछ नहीं ।
18/2/1963
जो शख्स बेवकूफ हो, ‘मूर्ख’ हो, ‘निरीह’ हो....उससे मोहब्बत करना क्या वाकई मुमकिन है ? क्या यह सही नहीं कि उसके लिए सिर्फ हमदर्दी या एक दीदी की या मां की ममता रखना ही ज्यादा सहज होगा ?
जिय पर विश्वास मामूली मामूली कार्यों के सिलसिजे में भी न रखा जा सके, उसके साथ महोब्बत का जज़्बा.....रखना.....!?
रियायत
रियायत करना भी एक चीज़ है ।
मैं कि महज एक पृष्ठभूमि हूं, एक ‘तकिया’ - सूफियों का सा ? कुछ नहीं हूं ।
- तो फिर मेरी नज़्में भी कुछ नहीं है ।
ऐसे आदमी की नज़्में क्यो होंगी ?
एसा आदमी क्या !!
22/2/1963
और ‘फे......’ ने अपने इदारिया (सम्पादकीय) में तमामतर मेरे खत का एक हिस्सा क्यों डाल दिया और कहीं उसका एतराफ (स्वीकृति) भी नहीं ः किसी सूरत नहीं ?
क्या ऐसा नहीं किया जा सकता था ? कि आप इदारिया के नीचे ब्रेकेट में ये चन्द अल्फाज जोड़ देते, ‘एक आधुनिक हिन्दी कवि के पत्र से ’ !
इदारिया, अर्थात आमुख पृष्ठ ही नहीं ; एक और स्वतंत्र रचना भी, ‘डायरी का एक पृष्ठ@उ.प.’ , लगता है बिल्कुल जैसे मेरे शब्द हों- बिलकुल मेरे शब्द ।
यह क्या माजरा है । कहीं मुझे ढूंढना होगा क्या अपनी डायरी में इसका मूल ?
और क्या इसीलिए मेरे पास यह अंक नहीं आया अभी तक....। इस विलम्ब के पीछे यह ‘मुजरिम की कचोट.... तो नहीं ?’
अजब बात है । है, ना ?
http://www.sahityadarshan.com/Diary.aspx
कविता : मंजु अरूण
एक औरत
एक औरत
चाहे तो बन सकती है
फूल, लता, तरू और
समय पड़े तो जंगल भी
एक औरत
चाहे तो बन सकती है
नदी, निर्झर, ताल और
समय पड़े तो आंधी बरसात भी
एक औरत
चाहे तो बन सकती है
धरती, आकाश, पाताल और
समय पड़े तो पूरा ब्रह्मांड भी
एक औरत
चाहे तो बन सकती है
दूर्गा, चण्डी, ज्वाला और
समय पड़े तो महाकाली, महाविकराली भी
एक औरत
मगर लाख चाहे तब भी
बन नहीं पाती कभी एक पुरूष
एक पूर्ण पुरूष
http://www.sahityadarshan.com/Poems.aspx
पुनर्पाठ के दौरान लिए गए नोट्स : रमेश खत्री : अज्ञेय की कथा नारी
समाज में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है, जो अपनी अभिलाषाओं को जो किसी कारण साकार न हो सही हो उसे कल्पना जगत में साकार करने का प्रयास करते हैं । शायद इसीलिये उनका स्वभाव अन्र्तमुखी हो जाता है । वे भले बहिर्मुखी होने का प्रयास भी करते हो पर अपने आपको ऐसा बना पाने में समर्थ नहीं हो पाते । अज्ञेय ने भी ऐसे ही नारी चरित्रों को अपने उपन्यासों के प्रश्रय दिया, जिनके अचेतन मन में दमित अभिलाषाओं की ज्वाला धधकती रहती है । वे इस ज्वाला का शमन करना चाहती हैं और करती भी हैं ।
नारी और तद्विषयक समस्याएं अज्ञेय के प्रायः सभी उपन्यासों में प्रमुख रूप से चित्रित हुई है । उन्होंने नारी के अन्र्तमन में झांकने का और उसकी अन्तःपरतों को उघाड़ने का प्रयास किया है । इसी के तादात्म में युगीन संदर्भ में नारी संबंधी नैतिकता.अनैतिकता, प्रेम.विवाह, यौन.स्वातंत्र्य आदि प्रश्नों को उठाकर नए नारी मूल्यों की स्थापना की जो उसके जीवन की सार्थकता, उसके व्यक्तित्व विकास, उसकी पूर्णता, आत्म.तुष्टि में सहायक बने । उनकी नारी पत्नीत्व की अपेक्षा नारीत्व, विवाह की अपेक्षा प्रेम और समाज की अपेक्षा व्यक्ति की महŸाा को मानते हुए परम्परागत सामाजिक मान मर्यादाओं की स्पष्ट रूप से अवहेलना करती है ।
अज्ञेय के साहित्य में नारी पूर्ण स्वतंत्रता की हिमायती दिखायी देती है । अज्ञेय नारी को मात्र नारी ही मानते हैं उसे नाते रिश्ते में समेटने को वे कतई तैयार नहीं । उनपके कथा साहित्य में नारी का व्यक्तित्व और अस्तित्व ही प्रमुख है, उन्होंने युगीन चेतना से संपृक्त ऐसी सजग और प्रबृद्ध नारी का अवतारणा की जो सतत नारीत्व की प्राप्ति मेकं संलग्न रहती है । नारी के व्यक्तित्व विकास में बाधक समाज सम्मत गतानुगति नैतिकमान मूल्य, परम्पराएं, धारणाएं और विधि निषेध उनकी दृष्टि में मूल्यहीन हैं । समाज व्यक्ति के निजी जीवन का निर्णायक नहीं है, इसलिए समाज का हस्तक्षेप अवांछनिय है । इससे उसके व्यक्तित्व विकास में बाधा पड़ती है । ‘शेखरः एक जीवनी’ में रेखा के माध्यम से वे कहते हैं, ‘मेरे कर्म का, सामाजिक व्यवहार का नियमन समाज करे, ठीक है, मेरे अंतरंग जीवन का दृनहीं । वह मेरा है । मेरा यानि हर व्यक्ति का निजी ।’
नेमीचन्द्र जैन का कहना है, ‘रेखा जैसी नारी हिन्दी कथा साहित्य में दूसरी नहीं है, वह हमारे आज के समाज के ‘अमानवीय नीति विधान के विरूद्ध तीखे किन्तु ऊपर से शान्त विद्रोह की मुर्ति है ।’ रेखा को पुरूष से कटुता मिली और समाज के नीति विधान से कष्ट ।’
दरअस्ल, अज्ञेय की स्त्री पुरूष में अपनी सार्थकता खोजती है, यथा -
‘एक बार मैंने मान से कहा था, क्या मेरे लिए लिख सकते हो.....यह दावा नहीं था कि मैं तुम्हारे जीवन का अर्थ और इति हूँ । अपने को अंत मानने का दुःसाहस मैंने नहीं किया......।’ (नदी के द्वीप)
‘मेरे लिए यह समूचा श्रीमतीत्व मिथ्या है, कि मैं तुम्हारी हूँ केवल तुम्हारी, तुम्हारी ही हुई हूँ....तुम्हीं मेरे गर्व हो, तुम्हारे ही स्पर्श से ‘सबल मम देह मन वीणा तन बाजे....।’ (नदी के द्वीव)
‘किसी तरह, कुछ भी करके, अपने को उत्सर्ग करके आपके ये घाव भर सकती तो अपने जीवन को सफल मानती ।’ (गौरा.नदी के द्वीप)
उपरोक्त दृष्टान्तों से स्पष्ट है कि अज्ञेय की नारी प्रकल्पना उसे पूर्ण स्वतंत्रता से मंडित नहीं करती । उसमें पुरूष मोह है, जो स्त्री को सदैव आश्रित (मानसिक संसार में तो अवश्य) देखना चाहता है । इतना अवश्य है, अज्ञेय ने नारी को ‘नैतिक रूढ़ियों’ के बंधन से, परम्परागत संस्कारों की बाध्यता से अवश्य मुक्त किया है । उनके रचना संसार में स्त्रीयाँ ‘साइमन द बुआ’ की शब्दावली में ‘सत्त आस्था में जीने वाली ही हैं , उनकी चरितार्थता का केन्द्र पुरूष ही है, पर हाँ इतना जरूर है िकवे भारतीय समाज की स्त्री को स्वतंत्रता के निकट लाते हैं और देशकाल की अग्रगामी चेतना को प्रकट करते हैं ।
http://www.sahityadarshan.com/Lekh.aspx
कहानी :संतोष श्रीवास्तव : नागफनियों के बीच
न जाने वह कौन सा संक्रंाति काल था जब कुमुद की मेडिकल की पढ़ाई समाप्त हुई थी और अमेरिका से कार्तिक भैया ने उसके और मां के लिये विजा, पासपोर्ट और हवाई टिकटों का इंतजान कर दिया था । बरसों से इंतजार करती मां का चेहरा दमक उठा था, ‘देर से ही सही अब हम नहीं रहेंगे यहां....वहां तुम अपना क्लीनिक खोलना और सुख और ‘शान्ति से भरी जिन्गदी जीना.....बहुत सहा हमने....बहुत ज्यादा...’
वह कहना चाहती थी, ‘क्यों मां तुम मुझे सागर में बूंद भर बनाना चाहती हो । क्यों चाहती हो कि मैं अपने टैलेंट को, अपने हुनर को यूं जाया कर दूं.....पर असमंजस में कुछ कह नहीं पाई ।’ इधर तो सब खत्म हो ही चुका है। पिछले महीने भैया ने आकर मकान बेचने की लिखा पढ़ी भी कर ली है, घर का फालतू सामान भी बेच दिया है। थोड़ा जरूरी सामान वो अपने सााि ले गये.....थोड़ा मां को लाने को कहा, ‘और जो बचे सब बेच कर आना, उधर इस सबकी जरूरत नहीं ।’
जरूरत होगी भी क्यों ? ये सब तो पापा के समय का वह आउट डेटेड सामन है जो अमेरिका जैसे भौतिक समृद्धिशाली महादेश में खपेगा नहीं । वह क्या जानती नहीं कि ‘वहां अपार्टमेंट होते हैं, वॉल टू वॉल कार्पेटिंग होती है । दीवारों पर तीज त्योंहारों परिचय देता रंग रोगन नहीं बल्कि पेपर चिपका होता है । तरह तरह कीआधुनिक सुविधाएं, कपड़े और बर्तन धोने की मशीन, माइक्रोवेव, बड़ा फ्रिज, कुकिंग रेंज, सोड़ा बनाने की मशीन, बॉटल खोलने की मशीन....इनके बीच फंसा आदमी भी एक मशीन.....नलों से निकल कर पानी की धार नीचे न जाकर ऊपर जाती है, लैफ्ट हैंड ड्ाइविंग है, घरेलू नौकर ढूंढे नहीं मिलेंगे, ‘भैया आखि क्यों तुम इतने प्रभावित हो वहां से ?’
‘क्या मां मीरा बाई पैदा करी है तुमने । लोग उस देश के सपने देखते देखते जिन्दगी गुजार देते हैं और इसे आसानी से मिल रहा है तो इतने नखरे !’
भैया के कड़वे वचन उसे कुरेदते नहीं बल्कि तरह आता है, भैया की सोच पर, मां की लालसा पर...कैसी आसान से पापा के बाद घर सहित उनकी सारी गृहस्थी बेच डाली है । पर मां का भी दोष नहीं । एक तो वे महत्वाकांक्षी महिला रहीं है, जो वे करना चाहती थी कर नहीं पाई । असफलता हमेशा उनका आंचन थामे रही, दूसरे पापा असमय चले गये और उनके जाने के बाद वे असहाय निरूपाय हो गई हैं । किसी ने उनकी पढ़ा नहीं बांटी, सब रो धोकर तेरह दिनों में लौट गये और चुप्पी साध ली जबकि जिन्दगी भर पापा की और से न तो कभी जायदाद में हिस्सा मांगा गया न किसी तरह की कोई सहायता । बल्कि पापा ही बुआओं की शादी में रूपया लेकर गये । चाचाओं की लिए भी नौकरी वगैरह की भागदौड़ की । पापा की सीमित गृहस्थी लेकिन असीमित आपसी लगाव । घर का हर कमरा हंयी, ठिठोली, प्यार, मनुहार से भरा होता । रात के खाने के समय का एक बड़ा हिस्सा उन चारो के ज्ञान को आपस में बांटने वाला होता । उस हिस्से से ही बड़ी शक्ति पाई है उसने हर तरह की परिस्थितियों से मुकाबला करने की, जझते रहने की । समय को हमेशा चुनौती माना उसने और इस तरह बड़ी उर्जा अर्जित करती रही वह । स्वभाव पापा का पाया...फकीरी...हर तरह से निर्लिप्त, लेकिन कार्तिक भैया हूबहू मां पर...इच्छा आकांक्षाओं का अंत नहीं । यह मानकर चलना कि यहां उनके टैलेंट की सही कीमत नहीं आंकी जायेगी सो विदेश प्रस्थान । ठीक उन्हीं क्षणों में वभी भी ठान बैठी कि मैडिकल की पढ़ाई के बाद यहीं अपने देश में...किसी पिछड़े इलाके में जाकर अपनी पढ़ाई को सार्थक करेगी । लेकिन यह बात उसने सभी से गुप्त रखी । हालांकि उसके फकीराना स्वभाव से परिचित मां अक्सर टहोका मारती, ‘न जाने कहां की संन्यासिनी आ गई हमारे घर में’ तो पापा हंसकर कहते, ‘तुम्हीं बहुत प्रभावित रहीं इस्कॉन से....और जाओ हरे रामा हरे कृष्णा मंदिर जहां मिस लारा भी ललिता बनकर गेरूआ साड़ी ब्लाउज पहने पीले बटुवे में अपना हाथा घुसाये हरे कृष्णा, हरे कृष्णा जपती हैं ।’
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पुस्तक समीक्षा : रमेश खत्री : एक अच्छा गाईड : राजस्थान में भ्रमण
राज्यों के पुर्नगठन की उहापोह में राजस्थान देश के सबसे बड़े भूभाग वाला राज्य बन गया, इसमें जहॉ एक ओर सांस्कृतिक विभिन्नता मिलती है तो वहीं दूसरी ओर बातचीत के लहजे में भाषा के स्तर पर काफी अंतर दिखाई पड़ता है कबीर के कथन - ‘‘ कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी ’’ को साकार करते हुए इस प्रदेश ने राष्ट्ीय स्तर पर ही नहीं अपितु अन्र्तराष्ट्ीय स्तर भी अपनी विषेश पहचान बना ली है, देश के सबसे बड़े राज्य राजस्थान के विशाल भूभाग की भौगोलिक विविधता अदभूत है, जहॉ एक तरफ सूदुर पश्चिम मेंे रेत के धोरों का साम्राज्य पसरा पड़ा ह,ै जिसमें रेत के टीबों के बीच से निकलता अस्त होता सूर्य मन को मोह लेता ह,ै तो वहीं दूसरी ओर अरावली की पर्वत श्रृंखला राजस्थान के मस्तक का ताज है, किन्तुं दक्षिण का भाग प्राकृतिक दृश्यों से सराबोर है, हरी भरी पहाड़ियां, उन्नत शिखर, प्रपात, नदियों के संगम मनोहारी दृश्य उत्पन्न करते हैं । राज्य का पूर्वी भाग पहाड़ी, मैदानी इलाका है जिसका अपना अलग ऐतिहासिक महत्व है । कुल मिलाकर राजस्थान पर्यटन की दृष्टि से अपनी अलग ही पहचान रखता है ‘‘अतिथि देवो भव’’ और ‘‘पधारों म्हारा देस’’ की परम्परा का निर्वहन करता राजस्थान पर्यटन के मानचित्र में उभरता सितारा ही नहीं वरन एक प्रचण्ड सूर्य है । पर्यटन की दृष्टि को ध्यान में रखकर विगत दिनों वांड्.मय प्रकाशन जयपुर से बालकृष्ण राव द्वारा विरचित पुस्तक ‘‘राजस्थान में भ्रमण’’ प्रकाशित हुई ।
दरअस्ल राजस्थान में भ्रमण का विशाल क्षैत्र है, यहॉं की भूमि का एक एक कण गौरवमयी गाथाओं, शौर्यमयी कृत्यों, कलात्मक शिल्पों का अनुपम संग्रह है । यहॉं का सांस्कृतिक परिवेश जिनमंे स्थानीय मेलें, उत्सव, समारोह मन पर विशेष छाप छोड़ते हैं । यहॉं की मिट्टी में अपनेपन की गंध समाहित है इसी कारण देसी विदेशी पर्यटक आकर्षित होता चला आता है ।
समीक्ष्य पुस्तक ‘‘राजस्थान में भ्रमण’’ बालकृष्ण राव की पर्यटन पर पहली ही पुस्तक है, इससे पहले उनकी ‘‘भारतीय संस्कृति के संदर्भ कोष’’ प्रकाशित हुई थी । राव ने समीक्ष्य पुस्तक में हिन्दी मेंे पर्यटन संबंधी इतनी अच्छी जानकारी उपलब्ध करवा कर पाठकों की राजस्थान के प्रति गहरी दिलचस्पी जागृत करने की कोशिश की है ।
राजस्थान वस्तुतः रंग रंगीला प्रदेश है, यहॉ की सांस्कृतिक गरिमा देश में ही नही वरन् विदेशों में भी अपना परचम फेलाये हुए है, यहॉ का इतिहास चाहे वह जयपुर हो, जैैसलमरे, कोटा, बूंदी, धौलपुर, भरतपुर, या फिर चितौड़गढ़ या उदयुपर का हो स्वणिम अक्षरों में लिखा हुआ है, यहॉ की धरती वीर प्रसूता के नाम से प्रसिद्ध है । यहॉं के बहादुरों ने इतिहास को रचा ही नहीं वरन उसे नयी दिशा भी प्रदान की, राजस्थान के कलाकारों ने अन्र्राष्ट्ीय स्तर पर पहचान बनाई चाहे ग्रेमी अवार्ड विजेता प. विश्वमोहन भट्ट हो या फिर कालबेलिया नतृकी गुलाबो, लंगा बधुओं की कला का जोहर भी कम नहीं है । बीकानेर, जैसलमेर के कलात्मक झरोखें और जालियां जिन पर की गई कलात्मक नक्काशी देखते ही बनती है । यहॉं का बंधेज, लहरिया, चूंदड़ी, सांगानेर और बगरू प्रिंट वस्त्र उद्योग में अपनी पहचान बनाकर अन्र्राष्ट्ीय स्तर पर फेशन की दुनिया मे अपनी छाप छोड़ चुके हैं । यहॉ के कलाकारों द्वारा संगमरमर के पत्थरों पर की गई सुंदर नक्काशी देखते ही बनती हैै, राजस्थान में शताब्दियों पूर्व बने किले जिनमें भटनेर, सिवाना, शेरगढ़, गागरोन, जयगढ़, मेहरानगढ़ अपनी शौर्यगाथाओं के साथ पर्यटकोंं को आमत्रिंत करते हैं । समीक्ष्य पुस्तक में लेखक ने 13 अध्यायों में महत्वपूर्ण जानकारी समेटने की कोशिश की जिसमें वें सफल भी हुए, यहॉं का सांस्कृतिक परिवेश, पूजा स्थल, लोक देवता, संत, लोक मनोरंजन, लोकनाट्य, किले, वन्यजीव अभ्यारण- पक्षीविहार, हस्तशिल्प, होटल रेस्टोरेंट, एतिहासिक पर्यटन स्थल इत्यादि की विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवाने का प्रयास किया है । राज्य के कुल 32 ज़िलों की ज़िलेवार ऐतिहासिक सांस्कृतिक जानकारी उपलब्ध करवाने का जो प्रयास लेखक ने किया वह उल्लेखनीय है ।
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Saturday, May 8, 2010
नैपथ्यलीला
विगत दिनों, जयपुर में साहित्य के नाम पर एक बड़ा तमाशा हुआ, जिसे कई मल्टी नेशनल कम्पनियों ने प्रायोजिय किया और साहित्य को एक ब्राण्ड की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया । इसी तरह के तमाषें यहा पर पिछले चार वर्षों से होते आ रहे हैं किन्तु इस साल इस तमाशे को राज्य की सरकार ने मान्यता प्रदान करते हुए मल्टी नेशनल कम्पनियों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी । इस तमाशे की मुख्य प्रायोजक संस्था को राजस्थान की विभिन्न अकादमियों के बजट में कटोती कर उस राशी को जो कुल जमा दस करोड़ रूपये है इस संस्था को हंस्तातंरित कर दी । जिसके परिणाम स्वरूप कई अकादमियों को अपने आगे के कार्यक्रमों को निरस्त करना पड़ा । अखबारों में छपे आधिकारिक बयानों के आधार पर इस संस्था को इसलिये राषि हस्तातंरित की गई क्यों कि यह संस्था विदेशी पैसा लाने की क्षमता रखती है । आधिकारिक तौर पर तो यह भी कहा गया, ‘साहित्य उत्सव से जयपुर के पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, इसकी ब्राडिंग होगी ।’ आमीन ।
इसी तरह विगत दिनों दिल्ली की एक अकादमी के पुरूस्कारों को सेमसंग ने रविन्द्रनाथ टैगोर के नाम से हथिया लिया । विष्णु जी ने इस पर गहरी चिंता जाहिर की किन्तु.....वही ढाक के तीन पात ।
कुछ भी हो इतना तो सत्य है कॉरपोरेट कम्पनियां साहित्य, संस्कृति में अपना भविष्य तलाश रही है और यहां उन्हें काफी पोटेषिंल नजर आ रहा है।
बहरहाल, कॉरपोरेट जगत का फैलता जाल किस तरह से हमें अपने षिंकजे में कसता जा रहा है दृष्टव्य है।
रमेश खत्री
दूधनाथ सिंह : डायरी : क्रूरता का पड़ोसी कौन है ?
एक बजे रात ।
बनारस. कार से । पूर्णिमा थी । बादलों के बीच से झांकता हुआ चंद्रमा । ठण्डी हवा के झोंके । मैं अपना हाथ बाहर निकाल कर बार बार हवा में हथेली फैला देता हूं , हवा हथेली पर थपेड़े मारती है । कार क्या है, खटारा है । खड़ खड़, भड़ भड़ की आवाज होती है । सड़क भी खराब । पीछे डा. देवराज, विजयदेव नारायण साही, रामनारायण शुक्ल (कहानीकार नहीं) और मैं । आगे ड्ाइवर के पास काशीनाथ सिंह और शुकदेव सिंह । यह रामनारायण शुक्ल बड़े ‘वल्गर’ ढंग से माक्र्सवाद के बारे में बाते करता है । पता नहीं साही और डा. देवराज उससे बहस में क्यों उलझे हैं । मैं लगातार बाहर देखता चल रहा हूं । यह रा.शु. माक्र्सवाद में अभी नौसिखिया है ।
आगे से बार बार ट्कें आती हैं और कार की गति धीमी हो जाती है । सामने से आती बैलगाड़ियों में बंधे बैलों की आंखें दूर से ही कार की हेड लाईट में बड़े विचित्र ढंग से चमकती हैं । मुझे कुंवर नारायण का वह बिम्ब याद आता है, ‘अंधेरे की सुरंग में दौड़ती हुई ।’ ‘अंधेरे’ की जगह शायद ‘रोशनी’ है क्या ? अंधेरा नहीं है । बादलों के भीतर से छन कर आती उजास है । पेड़ हैं अनेक ‘शक्लें बनाते हुए । हर पेड़ का अपना व्यक्तित्व है । कोई एक दूसरे की तरह नहीं । और सड़क के पास आती, फिर दूर जाती गंगा की चैड़ी धारा है । हर जगह वही मेरे बचपन की देहाती शान्ति है । घर, गाय.गोरू चारपाइओं पर सोये लोग । गांव....खेतों में हिराई भेड़ों के झुंड । और सर्राटे के साथ भागता हुआ मैं ।
डा.गंगाधर पुष्कर :कविता
चलो साथी
चलो साथी ! दर्द की बस्ती में
मस्ती के गीत गाये
भूले भटकों को राह दिखाएं
आतंक के सौदागरों से
वतन को बचायें
धुएं धुएं से इस आलम में
उम्मीदों के चिराग जलाएं ।
चलो साथी तेज धूप में
गुलमोहर सा खिल जाएं
बदले समीकरण में
अपने ही बने हैं कौरव
आओ अर्जून बन तीर चलायें
चाहतों की पाबंदी लगी है
संवेदनाओं का ज्वार लायें
ममता की बगिया को खिलायें ।
चलो साथी ! परिवार की पतंग को
सांसों की डोर से उड़ायें
उम्र के साथ बड़ा होना लाजिमी है
बड़े होने के फर्ज को बडप्पन से निभायें
जीवन को झुलसा री गर्म हवायें
सावन की घटा बन छायें । ,
चलो साथी । नव जागरण के गीत गायें
आत्ममुग्ध जन को आईना दिखायें
गैरों को अपनाए ! रूठों को मनायें
परिंदों सा चहचहायें
बंजर में फूल खिलायें ।
खुदगर्ज जमाने में
थरथराने लगा है तन मन
लड़खड़ाने लगी है धड़कन
दिमाग को नहीं, दिल को गुदगुदायें
स्नेहिल स्पर्श दें
रोते हुए अबोध को हंसाएं !
दिलों का आयतन कम हुआ है इन दिनों
चलो साथी ! दिलों को फैलाकर बसायें ।
रमेश खत्री : पुर्नपाठ के दौरान लिए गये नोट्स : शेखर के बहाने अज्ञेय की पड़ताल
‘शेखरः एक जीवनी (अज्ञेय का) हिन्दी का प्रथम उपन्यास है, जिसमें शिशु मानस के सपनों को, फ्रायड के शब्दों में ‘आनंद प्रधान’ जीवन की झांकियों को, उसके कुतुहल और जिज्ञासाओं को, उसकी स्वाभाविक प्रवृतियों पर समाज तथा माता पिता के व्यवहार या यों कहिये ‘रियलिटि प्रिंसिपल’ के संपर्क में उत्पन्न दमन को, मानसिक ग्रंथियों को तथा उसके जीवन व्यापी प्रभाव को कला क्षेत्र में लाने का प्रयास किया गया है । इसमें ‘आत्म’ और ‘अन्य’ के रिश्तों की समस्या को पैदा करके अज्ञेय ने ‘अस्तित्व’ के वृहद प्रश्न को भी खड़ा करने का प्रयास किया है । अज्ञेय की अनुभूति, बोध, कल्पना, अभिव्यक्ति इस समस्या को तलाशती है और आकार देती है । दरअस्ल यह समस्या उनका पूर्वाग्रह भी है, उद्विग्ता कारण भी और उनके सृजनात्मक पुरूषार्थ का उत्प्रेरक भी ।
साहित्य अस्तित्व का रणक्षेत्र न होकर, अस्तित्व के सहोदर रूप में उभरता है, इस अर्थ में ‘शेखर एक जीवनी’ उनकी अपनी आत्म परिभाषा के माध्यम से उपन्यास मात्र को भी परिभाषित करने का प्रयत्न करता है । यह उस बिन्दु से आरंभ होता है जहां पर जीवन का लगभग अंत हो चुका होता है । ‘शेखर’ अपनी सुनिश्चित आसन्न मृत्यु के दरवाजे पर खड़ा अपने विगत जीवन का ‘प्रत्यवलोकन’ करते हुए जीवन रच रहा है । इसीलिये यह ‘जीवन’ के अन्त और ‘जीवनी’ के आरंभ का बिन्दु है । इसे हम दूसरे शब्दों में ‘मृत्यु’ और ‘जीवनी’ दोनों का आरंभ बिन्दु भी कह सकते हैं ।
वास्तव में ‘शेखरःएक जीवनी’ एक उपन्यास है या कि जीवनी का ही एक छद्म रूप । स्वयं अज्ञेय ने भी बहुत जोरदार ढंग से इसके आत्म जीवनी होने का प्रत्याख्यान किया है । यहां पर कई बातें विचारणीय है मसलन नाम को ही लें ‘शेखर’ का पूरा नाम है ‘चन्द्रशेखर हरिदत्त पंडित’ और ‘अज्ञेय’ का ‘सचिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन’ । शेखर के पिता पुरातत्वज्ञ हैं, और ‘अज्ञेय’ के पिता भी पुरातत्वज्ञ और पुरा लेखों के शोधक थे । अज्ञेय के पिताजी को अपनी नौकरी के सिलसिले में देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाना पड़ता था, तो वहीं शेखर के पिता का तबादला भी कश्मीर, लाहौर, लखनऊ, सारनाथ, पटना आदि स्थानों पर होता रहता है । इस तरह हम देखते हैं ‘शेखर’ और ‘अज्ञेय’ के देशाटन की परिस्थितियां आपस में काफी मेल खाती है । इसी तरह से अज्ञेय भी सशक्त क्रांति मेंे हिस्सा लेते हैं और शेखर भी । जेल दोनो जाते हैं । दोनों का ढील ढोल और चरित्र बहुत कुछ समान है । ‘आत्मनेपद’ में अज्ञेय लिखते हैं, ‘वे बचपन से ही दुश्मन को शिकस्त देने के लिए अपने सिर का शस्त्रवत प्रयोग करते रहे हैं ।’ (आत्मनेपद 189) तो वहीं उपन्यास में ‘शेखर भी एक स्थान पर ऐसा ही करता है । (भाग 1@55)
निश्चल :व्यंग्य : जब मच्छर ने स्वतंत्रता का अर्थ समझाया
स्वतंत्रता दिनव की पूर्व संध्या पर एक मच्छर मरे गाल पर बैठकर मेरा खून चूस रहा था । उसकी बदकिस्मती कि मैंने उसकी टांग पकड़ ली और कहा क्यूं बे, शरम नहीं आती, मेरा खून तो वैसे भी चुसा चुसाया है, उसमें तुझे भी चैन नहीं । अरे नाशपीटे तुझे नेता, अभिनेता, भिखारी, मदारी, सेठ, साहूकार नहीं मिले सो कमबख्त एक लिखने पढ़ने वाले का खून चूस रहा है । जानता नहीं अभी एक आधुनिक मुक्त छंद सुनाकर तुझे जीवन के बंध से मुक्त कर दूंगा । मच्छर मुक्त छंद कविता के नाम से ही कंपकंपाने लगा और बोला, ‘सारी सर, आप चाहो तो वैसे ही मुझे मार डालो पर कविता सुनाकर.....न....न...न...।’ मैंने कहा, ‘ठीक है पर मैं तुझे मारूंगा जरूर ।’ वो बोला, ‘मेरा कसूर क्या है ?’ मैनंे कहा, ‘अबे घोचू, कसूर पूछता है । अबे मेरे गाप पर तू खून चूसेगा तो क्या मैं तुझे दूसरे गाल पर बिठाउंगा । अपना खून चुसाउंगा !’ वो घबराकर बोला, ‘पर सर कल आप स्वतंत्रता दिवस मनाने वाले हैं और आज आप मेरी स्वंतत्रता पर अटैक कर रहे हैं । ये तो घोर अन्याय है ।’ मैं भी ताव मेंे आ गया, मैंने कहा, ‘अबे स्वतंत्रता तो ठीक है, पर वो हम इण्डियन मनुष्यों की है तुम मच्छरों की नहीं । पर तुम नासपीटे फिर भी सब जगह घुसे फिरते हो ।’
कृष्णा अवस्थी : कहानी : तिनके का सहारा
यह समाचार जंगल की आग की भांति सब ओर फेल गया कि शीला की मां ने पिछले दिनों शादी कर ली । यह सब अविश्वसनीय लगा । पर जब उस गांव की स्थानीय महिलाओं ने इस बात की पुष्टी की तो मैं चुप हो गई सोचा हो सकता है यह सब सच ही हो ।
बच्चों की हाजरी लगाते जब‘शीला का नाम पुकारा तो सबने कहा, ‘जी ! वह आज छुट्टी पर है ।’ उसकी मां ने‘शादी कर ली है । आज वह मकान बदल रहे हैं, नए घर जाएंगे, ‘एक बालिका उत्साह से बोली ।’
मन में आया कि इस कहानी की जह में जाकर सारी बातों का पता लगया जाए । कई दिनों से सुशीला की मां दिखी नहीं थी, अगर यही सत्य है तो उसने ऐसा किया क्यों ? क्या विवशता ही होगी ?
एक दिन वह स्वयं ही धूम केतु सी कहीं से प्रकट हो गई । मैंने उसे कुरेदना उचित नहीं समझा उसने स्वयं ही प्रसंग आरम्भी कर दिया । उसकी एक बेटी‘शीला कक्षा पांच में व लड़का असीम चैथी कक्षा में था । दोनों पढ़ने में अच्छे थे । शनिवार को बाल सभा में ‘शीला ने अपनी गोरखा भाषा में जो कहानी सुनाई थी उसकी वह भाव भंगिमा व अपरिचित से बोल गुद गुदा गए थे । एक बार ‘राधा न बोले, न बोले, न बोले रे ’ इस भजन पर राधा कृष्ण बन कर सभी को मोह लिया था ।
बहिन जी यह दो बच्चें हैं इनकें सर्टीफिकेट मैं ले आई हूं । यह है जंग बहादुर तथा यह लड़की है अमिता ।
‘बच्चों ! मैडम को नमस्ते करो ।’
स्कुचाते हुए दोनों ने हाथ जोड़ दिए, ‘नया परिवेश उन्हें सहज होने में कुछ समय तो लगेगा ही।’ मैंने सोचा ।
‘दोनों का ेअब यहीं पढ़ना है, इन्हें दाखिल कर लें ।’ अच्छा अब मैं चलती हूं । छुटका घर में ही छोड़ा है पड़ोसन को बिठा कर आई हूं उसके पास ।
‘शीला की मां सांवले रंग की थी । नैन नक्श बहुत सुन्दर जैसे बड़े कौशल से तराशे हों । वह बड़ी आकर्षक थी लाल साड़ी में हरे ब्लाउज में ही प्रायः दिखाई देती थी । कल तक वह दो बच्चों की मां थी व आज पांच बच्चों की मां बन गई थी ।
डसका पति नौकरी की तलाश में घर से जो गया फिर वही का ही हो कर रह गया । सुनने में आया कि ओर विवाह कर लिया है । अब इनकी कभी सुध नहीं लेता जा कर कभी फूटी कौड़ी तक नहीं भेजी । बड़ी कठीनाई से ‘शीला असिम की पढ़ाई उसने जारी रखी कुछ उधार भी हो गया दुकानदारों ने कहा पहले पिछला हिसाब ठीक करो तभी ओर देंगे । उन्होंने उधार देना भी बंद कर दिया वह जानते थे कि इसके पास पैसे आएंगे कहां से ? कभी कभी तो बच्चें प्रायः भूखे ही सो जाते थे पर कभी किसी से बात तक नहीं की फिर भी पढ़ाई में सबको पछाड़ देते ।
Thursday, April 22, 2010
वर्तमान समय के उलझावो, तनावों के साथ ही युवा पीढ़ी के मानस में पनप रही है बाजारवाद की नव कोंपले पूर्ण रूप से पल्लवित और पुष्पित हो चुकी है । आज उनके मन बाजार ठाठे मारकर हंसता नजर आता है । बरसों की पष्चिमी मेहनत मानों रंग लाने लगी हो । बेढंग और निर्मम समय की छीछालेदर करता प्रोढ़ अपने आपको इस भीड़ में अकेला महसूस कर रहा है । वर्तमान पीढ़ी जहां एक ओर संत्रास, एकाकीपन, ऊब, भावनात्मक खोखलेपर को भोग रही है तो वहीं दूसरी ओर उसके मन में अदृष्य भय कुलांचे मारता है और इसी के वषीभूत वह दिन रात एक किये हुए है, रेस के घोड़ों की तरह । हर कोई एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में भागे जा रहा है । इस दोड़ ने वर्तमान समाज में एक नई सुगबुगाहट को जन्म दिया है और नतीजन परिवार विश्रृखलित और विखंडित होते जा रहे है ।
कहते हैं भाषा भावों की संवाहक होती है । निज भाषा में ही कोमल
भावों का सही सम्प्रेषण किया जा सकता है किन्तु यदि किसीको उसकी जमीन से काटना है तो उससे उसकी भाषा छीन लो । एक सोची समझी रणनीति के तहत हमारी युवा पीढ़ी से उसकी जबान छिनी गई और उसके मामने केरियरिज्म का एक ऐसा सुनहला जाल बुना गया, जिसमें सब कुछ गड्मड् हो गया । और हमारे हाथ में बचा धुंध और धुंआ जिसके पार दिखता है तो केवल और केवल बाजार दिखता है ।
अन्तर्राष्ट्यि राजनीति का कपट हमारे सम्मुख ठोठे मारकर हंस रहा है और हम उसके सम्मुख बौने और नपुंसक साबित हो रहे हैं । लेकिन विचारों की सुगबुहाट समय सापेक्ष है और वह लगभग षुरू हो चुकी है, जिसके आलोक में दूर तक देखा जा सकता है । एक नई सुबह को संवारने में लगी युवतम फोज सारे छल छदमों को तोड़कर अपनी रचनात्मकता से बांझ हुए विचारों में नवस्फुरण पैदा करेगी । यही विष्वास हर सवाल का जवाब होगा और हर कसौटी पर खरा उतरेगा ।
रमेष खत्री
भीमसेन त्यागी : डायरी : आत्ममंथन
19 सितम्बर, 1986
अभी अभी नई तारीख षुरू हुई है । मैं इसके इंतजार में था, बल्कि घात में । जैसे षिकारी अपने षिकार की घात में रहता है । षिकारी कौन है और कौन षिकार ? षिकारी और षिकार भी खुद मैं ही । अपने को हताहत करने और विजय दर्प से सुस्कुराने की यह कुटिल चेष्टा पिछले इक्यावन साल से चल रही है । आज मेरा जन्म दिन है और मैं इसे मरण दिवस की तरह मनाने के लिए विवष हूं । कल सुबह अलका से साथ मोहन के यहां गया था । लगभग पूरे दिन वहीं रहे । भाभी से ढेर सारी बातें हुईं । बोलीं, कल तो आपका जन्मदिन है, भाई साहब ?
‘कैसा जन्मदिन, भाभी’ मेरे मुंह से सहज ढंग से निकला, ‘अब तो मरण दिवस का इंतजार है ।’
भाभी ने कोई उपहार नहीं दिया और वह बहुत दुखी हो गई । लेकिन इसमें दुखी होने की क्या बात ! जन्म जितना सत्य है, उतना ही मरण । वह मुक्ति का माध्यम है । मरण न होता तो जीवन कितनी बड़ी सजा, कितना बड़ा बोझ बन जाता ? उस बोझ से मुक्ति का एक मात्र एक मात्र उपाय मरण है । फिर उसके लिए षोक क्यों ? लेकिन ष्षोक तो फिर भी ष्षोक होता है । वस्तुतः शोक मरण एवं मृत्यु प्राप्ति के लिए नहीं, भावनाओं तथा सुख सुविधा के उन सूत्रों के लिए है, जो उस व्यक्ति के साथ जुड़े थे और अब झटका खाकर टूट गए ।
पिछले दो वर्षों में जो कुछ हुआ, उसने जिंदगी की सार्थकता पर न जाने कितने प्रष्न चिन्ह लगाए और उनके उत्तर में न जाने तिना लावा भीतर ही भीतर उमड़ता रहा । इस मंथन में जीवन उसकी कोमलता, सौंदर्य एवं सुगंध के साथ साथ मृत्यु उसकी वक्रता, तीखापन और विरूपता भी मथी जा रही है । और यूं , जिंदगी और मृत्यु के बीच का फासला सिमटता निबटता रहा । आज मेरे लिए मृत्यु उतनी अजनबी नहीं है, जितने कुछ वर्ष पहले हुआ करती थी ।
लगता है, जिंदगी की पूरी बिसात ही उलट गई । तमाम मोहरे खिंड मिंड गए हैं । जैसी कोई भयानक भूचाल आया हो और कुछ ही क्षणों में ही पूरे भूमंडल को अस्त व्यस्त कर गया हो । मेरे भीतर और बाहर, सब कुछ टूटा और बिखरा पड़ा है । लाख कोशिश करता हूं, इसे समेटने की जितनी कोषिष करता उतना ज्यादा बिखराव । आखिर इस रेगिस्तान का कहीं अंत है ?
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रमेष खत्री : पुर्नपाठ के दौरान लिए गये नोट्स : वे दिन
साहित्य समय की सीमा को लांघकर भविष्य की ओर उर्ध्वमुखी होता है । किसी भी रचना के आइने में रचिता की दृष्टि तथा पात्रों में उसकी झलक दिखाई देती है । ‘वे दिन’ निर्मल वर्मा का पथम उपन्यास है । यह क्रिसमस के दिनों की गाथा समेटकर हमारे सभ्मुख ऐसे पात्रों को लाता है, जिनका वर्तमान युद्धोत्तरकालीन अतीत की विभीषिका पूर्ण स्थितियों के कारण अवसाद, भय तथा एकान्तिक हो चुका है । यहां पर अतीत की भयानका पात्रों को वर्तमान में भी भयग्रस्त किये हुए है, परिणामतः वे मानवीय संबंधों के संदर्भ में मात्र व्यक्तिवादी प्रवृति का ही प्रदर्षन करते हैं ।
दरअस्ल निर्मल वर्मा के इस उपन्यास में बदलते मानवीय रिष्तों, युग की विसंगतियों और अकेलेपन से उद्भूत विषेष मनोवृति के नये आयाम दृष्यमान हैं । इस उपन्यास के लगभग समस्त पात्र ही अपने अकेलेपन की मनोवृति से जूझकर आगे बढ़ते हैं । कथानक मैं का दुर्भाग्य यह है कि इस अकेलेपन के कारण उसके जीवन में ऐसी रिक्तता आ गयी है, जिसकी पूर्ति किसी भी प्रकार संभव नहीं है । इसी कारण उसे जीवन एकदम बेमतलब लगने लगता है । अपने अकेलेपन से पीड़ित होकर श्रीमती रायना से उस रीतेपन का वह भरना चाहता है । कभी वर्तमान में और फिर बाद में अतीत की जुगाली करके । श्रीमती रायना भी अकेली ही है, वह कभी अपने पति जाक के साथ प्राग आयीं थी । अब दोनों अलग हो गये हैं । पुत्र मीता को दोनों बांट लेते हैं । पिछले साल छुट्टियों में वह जाक के संग था । उसी के साथ युगोस्लाविया गया था । अब पिछले कुछ महिनों से रायना के साथ रह रहा है । टी.टी. अपने अकेलेपन में बहुत ऐग्रेसिव हो जाता है । उसकी मां बहुत अकेली है । बढ़िया बात यह है कि इस उपन्यास का हर पात्र दूसरे के लिए अंधेरा है ।
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कुमार अम्बुज : कविता
अतिक्रमण
अतिक्रमण के समाज में जीवित रहने के लिए
सबसे पहले दूसरे के हिस्से की जगह चाहिए
फिर दूसरे के हिस्से की स्वतंत्रता
अनंत है अतिक्रमण के विचार की परिधि
इसलिए फिर दूसरे के हिस्से का जीवन भी चाहिए
वासनाएं नए क्षेत्रों में करती है घुसपैठ
सिद्धांत और सुभाषित बदलने लगते हैं हथियारों में
समुद्र की तरफ
अंतरिक्ष की तरफ
पालात की तरफ
दसों दिषाओं में लालसाएं मारती हैं झपट्टा
फिर मारने की चीज के बारे में लंबे प्रचार के बाद
तय कर दिया जाता है कि वह जचाने के चीज है
जैसे जिसके पास अस्त्र है वही अमर है
फिर मनुष्य ही करते हैं
मनुष्यों पर अतिक्रमण
घेरते हुए खुद को वस्तुओं से
आसक्ति की चाषनी में वे पागते चले जाते हैं
एक नया संसार
जिसमें मानवीय दिखाता हुआ हर उपक्रम
किसी नयी वस्तु को ले सकने का सामर्थ्य बताता है
कितना दबाया हुआ है
दूसरे के जीवन का रकबा
और पृष्ठभूमि में से झांकती है कितनी वस्तुएं
इन बातों से ही फिर बनने लगती है
समाज में आदमी की आदरणीय पहचान ।
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रमेश खत्री : पुस्तक समीक्षा : ‘‘तटबंधों के सैलानी’’’
हम सदियों से सांस्कृतिक विखण्डन को सहते आये हैं, इसी के चलते विगत कुछ वर्षों से दलित विमर्ष और स्त्री विमर्ष का झंण्डा बुलंद करता साहित्य प्रकट होने लगा जिसने हमारी सोच को एक अलग दिषा में मोड़ने की कोषिष की नतीजतन हमारे वर्तमान जीवन में काफी उथल पुथल शुरू हो गई । हमारा समाज(परिवार) विखण्डन के कगार पर पहुँच गया और हम लगातार प्रगतिषील बने रहने का तमगा लिये दर दर भटकने को विवष हो गये । निंसदेह हमने एक नया बाज़ारवाद हमारे बीच पैदा किया किन्तु इस दौड़ में हमारे संबंधों का महिन ताना बाना अपने आपमें उलझता चला गया और हमें पता ही नहीं चला । इक्कीसवीं सदी के आते आते सामाजिक विखण्डन के स्पष्ट चित्र हमारे सम्मुख प्रकट होने लगे, अब आज की युवा पीढ़ी सामाजिक रिष्तों को इतना तवज्जो नहीं देती जितना कि अपने केरियर को । आज हर आदमी व्यक्तिवाद से ग्रसित हो केयरिस्ट हो गया है । कुछ इसी तरह के सवालों से जुझता अजित गुप्ता का उपन्यास ‘सैलाबी तटबंध’ विगत दिनों राधाकृष्ण पब्लिकेषन दिल्ली से प्रकाषित हुआ । अजित गुप्ता का यह पहला ही उपन्यास है किन्तु इसने साहित्य के दरवाज़े पर अनचाहे ही दस्तक दे दी है ।
समीक्ष्य उपन्यास ढाई सदी बाद यानि कि सन् 2151 की जीवन स्थितियों का काल्पनिक संसार हमारे सम्मुख रचता है और इस ढाई सदी के बाद भी मात्र सामाजिक विखण्डन के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आता । चारों तरफ टूटन और एकान्तिक जीवन पसरा नज़र आता है । जिस तरह की फैन्टेसी ‘सैलाबी तटबंध’ रचना चाहता है वह शायद पूरी तरह से साकार नहीं हो पाती क्योंकि लेखिका ने इस काल्पनिक तेईसवीं सदी में भी केवल आदमी की आदिम उच्छृंखला को ही महत्व दिया न कि उस समय के संभावित वातावरण को पैदा करने का प्रयास किया । हालाकिं उन्होने कोषिष जरूर की परन्तु पूरी तरह से उस समय का तकनिकी संसार रच नहीं पाई । उनकी कल्पना मात्र पारिवारिक विघटन पर ही अटक कर रह गई और वें स्त्रीयोचित दृष्टि से देखने को विवष हो गई और यह कृति भी स्त्री विमर्ष के खाते में चली गई ।
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Sunday, February 21, 2010
हाशिये की खदबदाहट से आतंकित समय
अपनीबात अभी ही हम इस दशक के अन्तिम सौपान पर पहुंचे है, अभी तक हमारे पैर इस लम्बी यात्रा की थकावट से कराह ही रहे है, इस बीतते दशक में बहुत कुछ घटा है और न जाने कितना दबा रह गया जो चाहकर भी उजाले में नहीं आ पाया । किन्तु दशक के अन्तिम समय में कुछ ऐसी खदबदाहट की आहटें हाशिये में सुनाई दी कि मुख्यधारा में बहने वाले हंसते मुस्कुराते चहेरे जर्द पतों से दिखाई देने लगे । समय ने उनको अर्श से उतार उनके नियत स्थान पर पहुंचा दिया । और अब वें हाशिये के कोनों में अपना मुंह छुपाए बैठे है ।इस बीते वर्ष में ही साहित्यिक जगत के सागर में कई उथल पुथल भरी लहरों ने कोहराम मच गया, नतीजतन कईं पत्रिकाएं करवट बदलते हुए आंखें मिचमिचाती उठ खड़ी हुई । उन्होंने साहित्य के आकाश में नवाकुंरित सितारों की फोज खड़ी कर दी । तो वहीं दूसरी ओर कई पुरोधा हमारे बीच से चले गये और वह खाली स्थान हमारे सम्मुख मौन का गहन पैथास उत्पन्न कर रहा है । इस सबके बीच कुछ ने तो प्रेम को परिभाषित करते कई अंकों का नया बाजार पैदा किया । कई विवादों ने जन्म लिया और कई तो अजन्में ही कालकवलित हो गये किन्तु समय ने संयम की सीमा में रहकर इस तरह किलेबन्दी की कि धुरधुराती रेत सा समय हाथ से फिसलता रहा और हमें पता ही नहीं चला ।और आज हम फिर उसी स्थान पर खड़े हैं जहां से शुरूआत की जाती है.....
रमेश खत्री
डायरी : चेकोस्लोवाकिया में आठ दिन : विष्णु प्रभाकर
चेकोस्लोवाकिया ! पूर्वी यूरोप का यह छोटा सा देश आज और भी छोटे छोटे दो देशों में बदल चुका है: चेक गणराज्य और स्लोवाक गणतन्त्र । लेकिन अप्रेल 1989 में जब मुझे वहां जाने का अवसर मिला, त बवह एक देश था और `साहित्य अकादमी´ की ओर से पांच भाषाओं के पांच साहित्यकारों का एक दल वहां घूमने जा रहा था ।वहां जाने से पूर्व ही मैं उस देश से परिचति हो चुका था । एक चेक विद्वान डा। पोरिजका, जो संस्कृत और हिन्दी के पण्डित थे, वहां के लिए एक पाठ्य पुस्तक तैयार कर रहे थे । यह चेक और हिन्दी दोनों भाषाओं में थी, उसके लिए वे भारत के दो भाषाविदों डा. सुनीत कुमार चटर्जी और डा. जगदीशचन्द्र जैन के अलावा मुझसे भी सहायता लिया करते थे । मैं विद्वान तो नहीं हूं लेकिन मेरा जन्म ठेठ उसी अंचल में हुआ है जहां खड़ी बोली हिन्दी बोली जाती है ।
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पुर्नपाठ के समय लिए गये नोट्स : मैला आंचल: जीवन राग की कहानी: रमेश खत्री
मैला आंचल´ का रचना समय भारत की आजादी के मुख्य वर्ष 1947 के आस पास का देड़ दो साल का समय ही है और कथा क्षैत्र उत्तरी बिहार के पुरनिया जिले का एक पिछड़ा गांव हैं । देश में घटित कुछ घटनाओं के अंश ही एक गांव की गगरी में समा पाते हैं, फणीश्वर नाथ रेणु ने उसी को समेटकर कथा का वितान ताना । 1942 के आन्दोलन से यह गांव अछूता था किन्तु आजादी के देशव्यापी उत्सव की तरंगों में यह गांव भी लहलहाने लगता है । परन्तु जमीन की भूख आधुनिक भारतीय ग्रामीण जीवन की एक प्रमुश समस्या ने उग्र रूप धारण कर पूरे गांव को इस भंवर में फसा लिया और फिर बापू की हत्या से उद्भूत करूण कृदन भी इस गांव में अनूठे ढंग से रंग जाता है ।`मैला आंचल´ की अद्भूत विशेषता यही है कि इसमें मिथिला के निरन्तर बदलते हुए आज के एक गांव की
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आलेख : नजीर अकबराबादी के काव्य में चित्रित भारतीय पर्व : डा।अब्दुल अलीम
लोक कवि नजीर अकबराबादी हिन्दुस्तानी गंगा जमुनी संस्कृति के प्रतीक हैं । उनका कार्यकाल अठारहवीं सदी के मध्य से उन्नीसवीं सदी के मध्य का है । नजीर अकबराबादी के रूप में हिन्दी और उर्दू साहित्य में एक विशेष परम्परा का सूत्रपात हुआ । जो तत्कालिन भारत के सांस्कृतिक रंगों से ओत प्रोत थी । लम्बे समय तक नजीर अकबराबादी लोक कवि की परम्परा रे रहकर साहित्य की दीघाZ से बाहर खड़े रहे । धीरे धीरे उनकी अपनी विशिष्ट दृष्टि के कारण उन्हें हिन्दी और उर्दू साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान मिला । नजीर की सांस्कृतिक दृष्टि के निर्माण में उनके काल में प्रवाहित सांस्कृतिक धारा और विशेषकर आगरा और उसके आसपास की संस्कृति की विशेष भूमिका रही है । आगरा मुगल सम्राट अकबर की राजधानी रह चुका था । जिससे वहां की मुस्लिम संस्कृति का वातावरण और ताजमहल के रूप में उदारतावादी संस्कृति के प्रतीक मौजूद थे । ताजमहल उस ‘शाश्वत प्रेम का प्रतीक बना खड़ा था जो भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व है । आगरा के निकट मथुरा वृन्दावन में राधा कृष्ण के प्रेम और भक्ति के गीत गूंज रहे थे । इन गीतों के साथ मेलों पर्वों और परम्परा भी ब्रज के साथ जुड़ी रही । इस मिली जुली संस्कृति ने नजीर की सांस्कृतिक दृष्टि को नये आयाम दिये । जिनकी अभिव्यक्ति सामासिक संस्कृति के रूप में उनके काव्य में हुई ।
ह्त्त्प//व्व्व।साहित्यादर्शन।कॉम/वीएव_लेख।अस्प्क्स?ईद=२०
कविता : मायामृग : सपनों का शस्त्रीकरणएक था सपना ।
सपनों का शस्त्रीकरणएक था सपना ।दूसरा था सपना ।दोनों लड़ रहे थे ।मैदान चुप था/क्योंकिसमझा रहा थासपनों को ‘शान्ति का अर्थ ।एक सपने के हाथ मेंतलवार थी ।तलवार का लोहाबहुत चमकीला था/औरधार धारदार थी ।लेहा पहले बहुत काला थामिट्टी सना भी थापर सपने ने दोनों हाथों सेपत्थर पर रगड़ रगड़बहुत चमका लिया था ।दूसरे सपने के हाथ मेंएक तलवार थीपर उसनेत्लवार से पहलेढाल बनाई थीजे अब तक बहुत काली थी ।क्लापन रात से आया थाक्योंकि धरती घूम गई थीसूरज पिछवाड़े गिर पड़ा था औरकछुए की पीठपहले थेड़ी लम्बी चपटी थीपर धीर धीरे गोल हो गईकछुआ अपने पैरों कोपीठ की खाल नीचेसिंकोड़ना जानता था ।मैदान पर दोनों सपने लड़ रहे थे ।सपनों में शब्द नहीं थे,सपनों में अर्थ नहीं थे,सपनों के पास हथियार थे ।देर तक युद्ध चलादोनों लहू लुहान हो गिर पड़ेमैदान के बीचों बीच ।मैदान के पास कच्ची मिट्टी थीउसने कोई तलवार नहीं बनाई ।सपने मर गयेमैदान हार गया ।सपनों का मरनातुमने भी देखा और तुमने भीतुम चुप रहेतुम चुप रहे ।मैदान का हारना मैंने देखामैं चीखूंगामैं चीखूंगा !
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कहानी : डा। पूरण सिंह : कायर नहीं था मैं
कहानी `हैलो........´`हैलो........´`आज मैं नहीं आ पाऊंगी, `शेखर ।´ मोबाइल पर आवाज सुनते ही शेखर बौखला गया था और चिल्लाया था, `क्यों नहीं आ पाओगी ?आज रक्षा बंधन है, पगले इतना भी नहीं जानते । तुम कहां जान पाओगे ? तुम्हारी कोई बहन होती तब न..... हां नही न्तो ।´ शैलजा ने फोन पर ही डांटते हुए शेखर से कथा था तो‘शेखर को लगा जैसे बादल फट गया हो, प्रलय आ गया हो और अचानक शान्त होते हुए बोला था, `कोई बात नहीं ।´दरअसल, शेखर और शैलजा एक दूसरे को प्यार करते थे । ऐसा शायद ही कोई दिन रहा हो जब वे आपस न मिले हों । शेखर इस शहर का माना हुआ गुण्डा था जो गांव से भागकर शहर में आ गया था ।`क्या हुआ शेखर तुम नाराज हो गये र्षोर्षो´ शैलजा का प्यार छलछला उठा था ।`नहीं शैलजा, सॉरी, मुझे माफ कर देना ।´ शेखर फोन पर ही बिलबिलाने लगा था और माबााइल स्विच ऑफ कर दिया था । न जाने क्यों आंखें भर आयी थी उसकी और आंखों से टपकते हर आंसू में उसे आराधना का मासूम सा चेहरा दिखाई देने लगा था । हां, हां, यही नाम तो था उसकी बहन का । बहुत प्यार करता था अपनी आराधना को वह । अम्मा और बाबू की मृत्यु के पश्चात् बहुत लाड़ प्यार से पाला था उसने आराधना को । कई बार तो सोते सोते ही आराधना आराधना करने लगता था वह, `उस दिन भी रक्षा बंधन ही था......´ सोचने लगा था शेखर । उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो कोई इतिहास से पन्ने चुरा रहा हो, ´.......उसकी आराधना थाली में मोतियों से सजी राखी लिये खड़ी थी । थाली में रोली और चन्दन रखे हुए थे और वह पागल सा निहारे चला जा रहा था अपनी आराधना को तभी तो वही बोली थी, `क्या भइया ऐसे ही देखते रहोगे या राखी भी बंधवाओगे ।´ देख लेने दे मुझे । तुझे देखकर ऐसा लग रहा है मानो परी उतर आयी हो आसमान से ।´ प्यार और स्नेह के साथ साथ ममता का समुन्दर हिलोरे मार रहा था उसके हृदय में कि तभी आराधना बोल पड़ी थी, `भइया, आप नज़र लगायेंगे मुझे ।´
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कहानी : शिब्बू : सूरज प्रकाश
कहानीहमने उस वक्त तक दौड़ में मिल्खा सिंह का ही नाम सुना था। हमें तब तक पता नहीं था कि बड़ी रेसों में दौड़ने के लिए खास तरह के जूतों की और तकनीक की ज़रूरत होती है। हमें यह भी पता नहीं था तब तक कि किसी भी दौड़ में अव्वल आने के लिए समय की गणना के लिए सेकेंड के हिस्से भी मायने रखते हैं और हम ये भी नहीं जानते थे कि ऐसी दौड़ों में दो चार सेंटीमीटर से भी पिछड़ जाने का क्या मतलब होता है। ये सारी बातें हमें बहुत देर बाद पता चली थीं। लेकिन उस सारे अरसे के दौरान हम एक बात अच्छी तरह से जानते थे कि हमारे स्कूल में और हमारे ही साथ, हमारी ही कक्षा में पढ़ने वाला शिव प्रसाद पंत किसी भी मिल्खा सिहं से कम नहीं है। बेशक उसके पास जूते, कपड़े और दूसरे तामझाम नहीं थे फिर भी उसमें बला की चुस्ती, फुर्ती और गति थी। वह जब दौड़ता था तो हमें चीते से भी तेज़ दौड़ता नज़र आता था और उसके साथ दौड़ने वाले उससे कोसों पीछे छूट जाते थे। वह हमेशा अव्वल था और हमारे लिए वही मिल्खा था। छोटे कद और गठीले बदन वाला हमारा शिव प्रसाद पंत हमारा हीरो था। हमें उस पर नाज़ था। वह हमारा अपना धावक था और उसका साथ हमें गर्व से भर देता था।
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व्यंग्य : धुंए की लत : अजय अनुरागी
व्यंग्य सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान की भारत में लम्बी परम्परा रही है । इस परम्परा को नष्ट करके संस्कृति पर कुठाराघात किया गया है । सार्वजनिक स्थानों को पहचाननते में धूम्रपान बहुत मदद किया करता था । जहां लोगनिश्चिन्त होकर चैन की सांस लेते हुए धुआं उड़ाते रहा करते थे, वह सार्वजनिक स्थान माना जाता था । जहां जितनी ज्यादा धूम्र लौ उठा करती थीं वह स्थान उतना ही बड़ा और महत्वपूर्ण होता था ।सार्वजनिक स्थल धुंए के सुरक्षित स्थान हुआ करते थे । इन स्थलों पर बैठकर एक फायदा यह भी होता था कि जो धूम्रपान नहीं करते थे वे भी बीड़ी, सिगरेट, चिलम, हुक्का आदि के धुंए का स्वाद पहचान जाते थे ।एक आदमी भागता हॉपता बस स्टेण्ड आता है । टिकिट लेने कतार में लगता है फिर सामान लेकर दौड़ते हुए बस में चढता है । बस की सीटें भरी हुई हैं । सामान सीट के नीचे लगाकर एक खाली सीट पर झपट कर बैठता है । बैठते ही चैन की सांस लेता है । जैसे ही चैन की सांस आती है वैसे ही जेब से बीड़ी का बण्डल निकाल लेता है । दूसरी जेब में माचिस ढूंढता है । फिर एक बीड़ी को मुंह में लगाकर जलाता है । पहला लम्बा कश खींचकर पास बैठे लोगों पर छोड़ता है । इस समय उसे बहुत बड़ा सुख मिल रहा है । इस सुखरूपी यज्ञ में धुंआ रूपी प्रसाद का लुत्फ दूसरे भी उठा रहे हैं । कभी वह धुंए की हवाई धारा बांए की तरफ बहाता है तो कभी दाएं हिस्से में । इस तरह बस चलने से पहले धुंआ धुंआ हो जाता है ।
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पुस्तक समीक्षा : एक उड़ान की शुरूआत: शहर की आखिरी चिड़िया : रमेश खत्री
`शहर की आखिरी चिड़िया´ कथाकार, उपन्यासकार डा। प्रकाश कान्त का पहला कहानी संंग्रह है । इसमें कुल जमा पन्द्रह कहानियांं संग्रहित है जो अपने लघु आकार के कारण पढ़ने की चुनोती देती है । मध्यप्रदेश के पिश्चमी निमाण में जन्में वरिष्ठ कथाकार डा. प्रकाश कान्त के इस कहानी संग्रह से पहले तीन उपन्यास `अब और नहीं´, `मक्तल´ और `अधूरे सूर्यो के सत्य´ प्रकाशित हो चुकें हैं। यह दिगर बात है कि प्रकाश कान्त पहले कहानीकार हैं बाद में उन्होंने उपन्यास लिखना आरम्भ किया । किन्तु कहानी संग्रह उनका बाद में आया और वह भी अन्तिका प्रकाशन के अस्तित्व में आने के साथ ।
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Saturday, January 16, 2010
समय को नाथने की कवायत
अपनी बात
आदमी की नीयति इस दुनिया में अपने स्तर पर अपने लिए अच्छे या बुरे समय का चुनाव करने की नही है समय को अपने स्तर पर आत्मसात करने भर की है । महानदार्शनिकों की चिंता का विषय रहा है, `समय को अपने स्तर रांदने का´ । सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और व्यक्तिगत उथल पुथल के बीच महान व्यक्तियों की सोच हमेश उध्र्वमुखी रहती आई है । समयाघारित परिस्थितियों का भांपकर उन्होंने सोच के नये केन्द्रबिन्दू निर्धारित किये और उस पर चलकर सफलता भी हासिल की फिर चाहे कबीर हो या मीरा, तुलसी हो या सूर सभी ने परिवर्तन की आहट को एक सा अहसास किया और राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक उथल.पुथल में अपने विचारों का ही नहीं वरन् अपने जीवन का भी हव्य किया । कई.कई विचारक तो अपना सर्वस्व होम कर परिवर्तन की आंधी में सड़क पर उतर आये और आमजन के कांधे से कांधा मिलाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई । इसी सबके चलते एक अच्छे समाज के निर्माण के उनके स्वप्न को बल मिला और उन्होंने अपने जीवन को साकार पाया ।
वर्तमान समय में जिस तरह से समाज में भ्रष्टाचार, रक्तपात, चोरी.डाके, लूट.पाट, कुकर्म और सामाजिक कुरीतियों का बोल.बाला है । ऐसे समय में समाज और लोगों का भला चाहने वाले विचारकों की सख्त आवश्यकता है जो आगे आकर नई दिशा की ओर ईशारा करे और जीवन को सुखमय, शान्तिमय बनाने के रास्तों पर आमजन को न केवल अग्रसित करे अपितु स्वयं उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चले ।
वैसे तो ढोंगी बाबाओं से यह संसार अटा पड़ा है जो अपनी अपनी दुकानें सजाये बैठे हैं और मावनता के मंत्र को धारण करने का प्रदशZन करते नहीं अघाते । जबकि उनके जीवन का मुख्य लक्ष्य भौतिक सम्पदा एकत्रित करने के अलावा कुछ नहीं होता । छद्म मावनता का बीज उनके मानस में कुलबुलाता तो है जिसे वे व्यावसायिकता में तब्दील कर लेते हैं ।
वर्तमान वैश्वीकरण और भू मंडलीकर के दौर में विचारों के अबाध विस्तार और समानान्तर विकास के लिए, लोक संस्कृति और उसके अस्तित्व को बचाने के लिए बाजारू चुनौतियों के खिलाफ खड़ा होने की जरूरत अत्यन्त बलवती हो गई है और युवा पीढ़ी को इस राह पर लाने के लिए लोक लुभावनता और रोमान का संज्ञान लोक संस्कृति की विषयवस्तु को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की जरूरत आन पड़ी है ।
इस वर्ष के जाते.जाते हमें आकन करना होगा, `हमने इन तीन सौ पैसठ दिनों में अपने लिए कितना समय जाया किया और लोक के लिए कितना उपयोग किया । यदि हम इसमें तालमेल नहीं बैठा पाते तो जीवन को अकारथ ही समझना ।´ बेशक हम सजाये रंगोली आगत के लिए किन्तु जिसने हमारे साथ इतना लम्बा अरसा बिताया उसके आचार व्यवहार को भी कसोटी पर परखने की आवश्यता है, । हमें समय को तो नाथना ही होगा, तभी हम एक सुखद कल की कल्पना कर सकेगें ।
रमेश खत्री
प्रेम कविता :एक कवि की नोट बुक : मेरी दिनांकिता (डायरी) में किसी सूफी कवि की एक कविता लिखी है । पता नहींकब इसे, किस किताब या पत्रिका से उतारा था । कविता के नीचे कवि का नाम भी नहीं है ।
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रमेश खत्री : नदी के द्वीप : कितनी नदी कितने द्वीप : नदी के द्वीप´ अज्ञेय का दूसरा उपन्यास है । स्वातंत्रोत्तर युग के प्रणीत अज्ञेय पर इस उपन्यास में जीवन की यथार्थता को प्रभावशाली ढंग से चित्रित न कर पाने का इल्जाम लगाया जाता रहा है ।
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संदीप श्रोत्रिय : कविता : बिना थके एक चिड़िया उड़ते http://www.sahityadarshan.com/Poems..aspx
पुस्तक समीक्षा : चिल्लर चिंतन :एसा मानने में
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कहानी : सुषमा अग्रवाल : शापिंग काम्पलेक्स शापिंग काम्पलेक्स के सामने आकर एक कार रूकी । लाल रंग की साड़ी पर बाजुकट ब्लाउज पहने, आंखों पर धूप का चश्मा लगाये उस महिला की उम्र ३२-35 वर्ष के लगभग थी । लेकिन चेहरे पर चमक और मेकअप से वह कम उम्र की नजर आ रही थी ।
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व्यग्य : संकट में आम आदमी :नंगे आदमी से खुदा डरे अर्थात आम
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Monday, December 14, 2009
साहित्य दर्शन. कॉम का नवेम्बर ०९ अंक
भविष्य की ओर उन्मूख
अपनी बात हम इस दुनिया में अपनी इच्छा से नहीं आते और न ही हम यहां आने के लिए किसी प्रकार का चुनाव कर पाते हैं । जब हम सोच के दायरों में आते हैं तो हमारे सम्मुख दार्शनिकों की विचार परम्परा की लम्बी कतार दिखाई देती है, जो सोच के विभिन्न पहलुओं को आदि अनादिकाल से पोषीत और पल्लवित करते रहे हैं और विभिन्न चौखानों में जीवन को बांटते रहे । हम भी यहां आने के बाद जाने अनजाने इन्हीं चौखानों में अपने आपको पड़ा पाते हैं और फिर हमारा सम्पूर्ण जीवन इन्हीं से जुझते हुए बीत जाता है । कुछ लोग होते हैं जो अपने जीवनकाल में इससे उबर जाते किन्तु कुछ को तो पता ही नहीं लगता और लिपटे रहते है इसी सब से । और फिर अन्त में `ज्यों की त्यों धर दिन्ही चदरिया´ से कूच कर जाते है इस दुनिया से । आए हैं तो जाना भीनिश्चित है, लेकिन अपने जीवन में कुछ ऐसा नया कर जाने की लालसा हममें सदैव बनी रहती है। पर कई बार हमें रास्ता नहीं मिल पाता और कई बार हम कोशिश ही नहीं करते, नतीजतन हमारे सम्मूख हमेशा यह शाश्वत प्रश्न टंगा रहता कि हम किस रास्ते पर चले और जीवन की नैया को पार लगाए र्षोर्षो यह शाश्वत प्रश्न हमेशा मुह बाये रहता है और इसी सोच में जीवन का अधिकांश समय बीत जाता है, `मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं ´ इसी द्वैत में जीवन कब पार हो जाता पता ही नहीं चलता ।समय की सलीब पर खड़े हुए हमें सोचना होगा, हमारा कार्य व्यवहार समाज में किस रूप में प्रसारित होगा और उसका आने वाली पीढ़ीयों पर क्या असर होगा र्षोर्षो जब हम इस विषय पर गंभीरता से सोचने बैठेगे तो हमारे सम्मुख खुलती जायेगी जीवन अबूझ पहेली और लोक जीवन की सादगी हमारा आव्हान करेगी तब नई राहें हमारे सम्मुख खुलने लगेगी । जिन पर चलते हुए हम उन मंजिलों को छू सकेगें जिनकी खिड़की भविष्य की तरफ खुलती है ।अभी पिछले दिनों भाई मायामृग ने एक पत्र के माध्यम से पुस्तक पर्व मनाने की अपनी महत्ति योजना से अवगत कराया । आज जब प्रकाशन व्यवसाय मेंवैश्विक बाज़ारवाद अपने पैर पसार चुका है और प्रकाशक बगैर लेखक को पारिश्रमिक का भुगातन किये उसके पसीने को पूरा का पूरा हजम कर जाने को आतुर बैठे हों, ठीक ऐसे समय में जब पुस्तकों की कीमतें आसमान छू रही हो और वह केवल और केवल सरकारी खरीद का हिस्सा बन रह गई हो । और इस सबके चलते पुस्तकें आम पाठक की पहुंच से बाहर निकल गई हो, ठीक ऐसे घोर बाज़ारवादी समय के बीच बोधि प्रकाशन के माध्यम से भाई मायामृग का पुस्तक मनाना एक नई राह खोजने की ओर संकेत है । उनकी इस महत्ती योजना `पुस्तक पर्व´ में देश प्रदेश के चुनिंदा लेखकों की पुस्तकें पेपरबैक कलेवर में न्यूनतम मूल्य यानि मात्र दस रूपये में उपलब्ध करवाई जायेगी । लगभग अस्सी से छियाणवे पृष्ठों की पुस्तक का मूल्य मात्र दस रूपये होगा और एक सेट में दस पुस्तकें होंगी । यानि एक सेट का मूल्य मात्र सौ रूपये। इस मायने में देखें तो एक सेट में आठ सौ से लेकर एक हजार पृष्ठों की सामग्री मात्र सौ रूपये में पाठक को मुहय्या करवाई जायेगी । मायामृग की यह महत्वकांक्षी योजना उन प्रकाशको को करारा जवाब हो सकती है जो बरसों से पुस्तकों से पठाकों की दूरी का रोना रोते रहे हैं । भाई मायामृग को `पुस्तक पर्व´ हेतु बधाई और इसके आशान्वित नतीजों हेतु शुभकामना..........!
रमेश खत्री
डायरी : से.रा.यात्री : मैंने विचार बांटा था बम नहीं..... 3 जनवरी, 1995नागपुर से लगभग ग्यारह बजे छुटी ट्रेन ठीक समय से हैदराबाद पहुंच गई
http://http://www.sahityadarshan.com/View_Diary.aspx?id=१९
आलेख : वर्षा खुराना : "लोक और उसका मंगलमय आलोक......" लोक शब्द संस्कृत के `लोक दर्शन ´ धातु से धनजय प्रत्यय करने पर निष्पन्न हुआ है ।´ इस धातु का अर्थ है `देखना´ जिसका लट् लकार में अन्य पुरूष एक वचन का रूप लेते हैं अत: `लोक´ शब्द का अर्थ हुआ देखने वाला वह समस्त जन समुदाय जो इस कार्य को करता है, लोक कहलायेगा ।
http://http://www.sahityadarshan.com/View_Lekh.aspx?id=१७
कहानी : डॉ.प्रकाश कान्त : "हुजूर सरकार और........ " ऐसा अचानक हुआ था । अचानक वह और साहब उस बहुत ही छोटी सी जगह पर मिल गये थे ।
http://http://www.sahityadarshan.com/View_Story.aspx?id=१३
कविता : अलीक : शबरी शबरी, अपना दुख:ड़ाकभी किसी सेन कह पाईरूखा-सूखा.....खटता रहा जीवनचंद गिनते धेले-पाई ।
सुनो, सुदामा : सुनो, सुदामाजो कुछ घर कुटियो में होचना चबैना, आना
मन के मोर न नचा सांवरी : थोड़ी सी खुशी..... छोटे से सपने लेकरअंग अंग मटका के न नाच बावरीजालिम देख रहा है
http://http://www.sahityadarshan.com/View_Poem.aspx?id=22
व्यंग्य : अनुज खरे : नारी धर्म उर्फ संदेह परमोधर्म:
देश की प्रत्येक नारी को अपने पति पर संदेह करना ही चाहिए । उसके हर ज्ञात अज्ञात कारण पर संदेह रखना ही चाहिए । संदेह करने के हर कारण पर संदेह करना चाहिए ।
Friday, December 4, 2009
साहित्य दर्शन अक्टूबर २००९
| समय के मर्म पर दस्तक | ||||||
| अपनी बात आज के इस हाहाकारी दोगले समय में जहां विदेशी पूंजी अपना नंगा नाच दिखा रही है और बाजारवाद अपने परचम फहराता हुआ हमारे बीच के संबंधों लगातार कुतर रहा है । वह हमें धकिया रहा है एक व्यक्ति परिवार की धुरी में जहां हमारी सकारात्मक सोच भी हाशिये पर धकेली जा रही है । साहित्य के विभिन्न आयामों में पसरा पड़ा है गहरा पैथास जिसकी सांय सांय संस्कृति और लोकजीवन को लगातार कुतर रही है । वस्तुत: यह समय संबंधों की धूरी पर लगातार हमले कर रहा है और उन्हें बौना साबित करने के प्रयास में लगा है ।
कहानी : डॉ पूरण सिंह - मेरी माँ बनोगी कविता : सुदीप बनर्जी - शब गश्त और हर चीज की तरह सर्द है चींटी का लेख : अनिल मिश्र - वैश्वीकरण के शिकंजे में लोक संस्कृति पुस्तक समीक्षा : रमेश खत्री - स्त्रीयोचित गहन अनुभूतियों की कविताएं | ||||||